गढ़वा। मंगलवार को गढ़वा में सामने आई एक दर्दनाक घटना ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। आज के दौर में सोशल मीडिया पर कुछ पल की ...
गढ़वा। मंगलवार को गढ़वा में सामने आई एक दर्दनाक घटना ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। आज के दौर में सोशल मीडिया पर कुछ पल की लोकप्रियता और एक बेहतर रील बनाने की चाह किस तरह जिंदगी भर का दर्द दे सकती है, यह घटना उसका बेहद गंभीर उदाहरण बनकर सामने आई है। रील बनाने के दौरान एक युवती के दोनों हाथ गंवा देने की खबर ने न केवल युवाओं, बल्कि अभिभावकों को भी आत्ममंथन करने पर मजबूर कर दिया है।आज मोबाइल फोन जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। पढ़ाई, कारोबार, नौकरी, सूचना और आपातकालीन जरूरतों से लेकर मनोरंजन तक मोबाइल का इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन जब यही मोबाइल जरूरत से बढ़कर जुनून बन जाए और सोशल मीडिया पर कुछ सेकंड की रील के लिए युवा अपनी जान तक जोखिम में डालने लगें, तो यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है।टीवी चैनलों, समाचार पत्रों और सोशल मीडिया के माध्यम से आए दिन ऐसे हादसों की खबरें सामने आती रहती हैं, जिनके बारे में आम इंसान कल्पना तक नहीं कर सकता। कभी चलती ट्रेन के सामने रील बनाने की कोशिश, कभी ऊंची इमारतों और पहाड़ों पर खतरनाक वीडियो बनाने का जुनून तो कभी सड़क पर स्टंट करते हुए जान गंवाने की घटनाएं सामने आती हैं। इसके बावजूद सोशल मीडिया की चमक-दमक और लाइक-कमेंट की चाह में बड़ी संख्या में युवा जोखिम उठाने से पीछे नहीं हटते।गढ़वा की यह घटना भी इसी बदलते दौर की ओर गंभीर इशारा करती है। जिस रील को कुछ क्षणों के मनोरंजन या पहचान का माध्यम समझा गया, वही जिंदगी भर का दर्द बन गई। आज जरूरत इस बात की है कि युवा यह समझें कि सोशल मीडिया पर कुछ लाइक और व्यूज कभी भी अपनी जिंदगी और शरीर से ज्यादा कीमती नहीं हो सकते।
मोबाइल साधन है, जिंदगी का विकल्प नहीं
मोबाइल का इस्तेमाल गलत नहीं है, लेकिन उसका अंधाधुंध और लापरवाही भरा इस्तेमाल निश्चित रूप से खतरनाक हो सकता है। खासकर युवा वर्ग को यह समझना होगा कि हर ट्रेंड को फॉलो करना जरूरी नहीं है और हर वायरल वीडियो को दोहराना समझदारी नहीं है।अभिभावकों की भूमिका भी यहां बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चों और युवाओं को केवल मोबाइल इस्तेमाल करने से रोकना ही समाधान नहीं है, बल्कि उनके साथ समय बिताना, उनसे बातचीत करना, सोशल मीडिया की वास्तविकता समझाना और खतरनाक गतिविधियों के परिणामों के प्रति जागरूक करना भी जरूरी है।आज कई घरों में स्थिति ऐसी हो गई है कि परिवार के सदस्य एक ही छत के नीचे रहते हुए भी अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। बातचीत कम हो रही है और स्क्रीन टाइम बढ़ता जा रहा है। ऐसे में परिवार और समाज दोनों को मिलकर इस बदलती आदत पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
एक रील के लिए जिंदगी को जोखिम में डालना कहां की समझदारी?
युवाओं को यह सवाल खुद से पूछना होगा कि क्या कुछ सेकंड की रील के लिए जिंदगी को खतरे में डालना उचित है? सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो सकता है, लाइक और कमेंट मिल सकते हैं, लेकिन अगर हादसा हो जाए तो उसे वापस नहीं लिया जा सकता।गढ़वा की इस घटना से जिले के हर युवा और हर अभिभावक को सबक लेने की जरूरत है। रील बनाएं, लेकिन सुरक्षित तरीके से; मोबाइल चलाएं, लेकिन मोबाइल को अपनी जिंदगी न चलाने दें। घर के बड़े-बुजुर्गों की सलाह को पुराने जमाने की सोच समझकर नजरअंदाज करने के बजाय उनकी बातों को सुनना और उसके पीछे छिपे अनुभव को समझना भी जरूरी है।आज आवश्यकता मोबाइल छोड़ने की नहीं, बल्कि मोबाइल के सही और जिम्मेदार इस्तेमाल की है। परिवार में संवाद बढ़े, युवाओं को समय दिया जाए और सोशल मीडिया की आभासी दुनिया से ज्यादा वास्तविक जिंदगी की अहमियत समझाई जाए—तभी ऐसी दर्दनाक घटनाओं पर रोक लगाने की दिशा में सार्थक कदम उठाया जा सकेगा।
एक वीडियो कुछ सेकंड का होता है, लेकिन एक गलती का दर्द पूरी जिंदगी का हो सकता है। गढ़वा की यह घटना इसी कड़वी सच्चाई को सामने रखती है।
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