गढ़वा। गढ़वा में अकीदत व मसर्रत के साथ ईद-उल-फितर का त्योहार मनाया गया। झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री झामुमो के केंद्रीय महासचिव मि...
गढ़वा। गढ़वा में अकीदत व मसर्रत के साथ ईद-उल-फितर का त्योहार मनाया गया। झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री झामुमो के केंद्रीय महासचिव मिथिलेश कुमार ठाकुर ने गले मिलकर इस्लाम धर्मावलंबियों को ईद की मुबारकबाद दी। श्री ठाकुर ने गढ़वा ईदगाह, उंचरी मस्जिद एवं मदरसा तब्लीगुल इस्लाम आदि स्थानों पर पहुंचकर ईद की नमाज के बाद लोगों से गले मिलकर उन्हें ईद की मुबारकबाद दिया।मौके पर श्री ठाकुर ने कहा कि ईद खुशियों का त्योहार है। इस दौरान सभी लोग आपसी बैर भाव भुलाकर एक दूसरे को गले लगाते हैं। यह पर्व आपसी प्रेम, सांप्रदायिक सौहार्द व भाईचारा का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि एक महीने रोजा रखने के बाद यह पर्व आता है। ईद का चांद दिखने के बाद पूरी दुनिया में ईद का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन मुस्लिम भाई विभिन्न मस्जिदों, ईदगाहों आदि स्थानों पर नमाज पढकर देश एवं समाज की अमन, चैन, सामाजिक समरस्ता, संप्रदायिक सौहार्द की दुआ करते हैं। उन्होंने कहा कि हमारा देश एकजुट रहे, संविधान सुरक्षित रहे, हिंदु, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई सभी हमेशा भाईचारे के साथ रहें, गढ़वा सहित पूरे देश में संप्रदायिक सौहार्द एवं भाईचारा बनी रहे आज वे यही कामना करते हैं। गढवा के लोग आपसी भाईचारा की ऐसी मिशाल बनें कि पूरी दुनियां के लिए उदाहरण हो। प्रकृति और जीवन के बीच सामंजस्य को रेखांकित करता है सरहुल का पर्व : मिथिलेश ठाकुर
मांदर बजाकर खूब थिरके पूर्व मंत्री मिथिलेश, दी सरहुल की बधाई
गढ़वा। प्रकृति का महापर्व सरहुल गढ़वा में पारंपरिक श्रद्धा एवं उल्लास के साथ काफी धूमधाम से मनाया गया। सरहुल के मौके पर शनिवार को झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री झामुमो के केंद्रीय महासचिव मिथिलेश कुमार ठाकुर नगदरवा गांव पहुंचे। वहां आदिवासी परिवारों के साथ पूर्व मंत्री श्री ठाकुर ने मांदर बजाकर उनके साथ सरहुल मनाया। श्री ठाकुर ने सभी को सरहुल की बधाई देते हुए उनके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि एवं नई उर्जा के संचार की कामना की। मौके पर श्री ठाकुर ने कहा कि सरहुल का पर्व मूलतः प्रकृति और जीवन के बीच सामंजस्य को रेखांकित करता है। सरहुल मुख्य रूप से आदिवासी समुदायों का प्रमुख प्रकृति पर्व है, जो वसंत ऋतु में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। यह पर्व प्रकृति के प्रति आभार, साल वृक्ष की पूजा, नई फसल के स्वागत और नए साल की शुरुआत के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि सखुआ के पेड़ को आदिवासी संस्कृति में पवित्र माना जाता है। जिसमें सरना मां का वास माना जाता है। इस दिन साल के नए फूल (सारजोम बाहा) की पूजा की जाती है। सरहुल का अर्थ ही है वर्ष की शुरुआत। जो नई फसल और प्रकृति के नए चक्र का प्रतीक है। इस दिन पाहन (पुजारी) बारिश और अच्छी फसल की भविष्यवाणी करते हैं। यह पर्व पूरे समुदाय के लिए नृत्य-संगीत और सामूहिक खुशी साझा करने का एक मौका है। उन्होंने कहा कि यह सदियों पुरानी परंपरा है, जिसे महाभारत काल से संबंधित माना जाता है। जहां आदिवासी पूर्वजों को साल के फूल अर्पित करते थे। इस दिन सुबह पूजा के बाद, पाहन मिट्टी के बर्तनों में जल भरकर रखते हैं, जिससे आने वाली बारिश और फसल का अनुमान लगाया जाता है। इस अवसर पर पारंपरिक नृत्य, संगीत, शोभायात्रा और गुड़ पिठ्ठा जैसे पारंपरिक पकवान प्रमुख होते हैं। यह पर्व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रकृति के साथ संतुलन और विकास का संदेश देता है। जहां आदिवासी समाज प्रकृति को अपना जीवन आधार मानकर उसे नमन करते है।खबर देखने के लिए channel को सब्सक्राइब करें, बेल आइकॉन को दबाएं, लाइक करें औऱ लिंक को शेयर करें।




टिप्पणियाँ