गढ़वा।आज शुक्रवार, 16 जनवरी को पलामू सांसद विष्णु दयाल राम ने अपने आवासीय कार्यालय शांतिपुरी, मेदिनीनगर में प्रेस वार्ता आयोजि...
गढ़वा।आज शुक्रवार, 16 जनवरी को पलामू सांसद विष्णु दयाल राम ने अपने आवासीय कार्यालय शांतिपुरी, मेदिनीनगर में प्रेस वार्ता आयोजित कर राजहारा कोल परियोजना के इतिहास, वर्तमान स्थिति और भविष्य की कार्ययोजना पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राजहारा कोलियरी सिर्फ एक खदान नहीं, बल्कि पलामू क्षेत्र के औद्योगिक, आर्थिक और सामाजिक विकास की रीढ़ रही है और आगे भी बनेगी। सांसद श्री राम ने बताया कि वर्ष 1842 में मेसर्स बंगाल कोल कंपनी लिमिटेड द्वारा राजहारा कोलियरी में भूमिगत खनन कार्य शुरू किया गया।1969 में इसका स्वामित्व मेसर्स रामसरन दास एंड ब्रदर्स को सौंपा गया, जहां भूमिगत खनन जारी रहा।1973 में खदान के राष्ट्रीयकरण के साथ इसके संचालन में बड़ा बदलाव आया।लगभग 149 वर्षों तक लगातार खनन के बाद 1991 में भूमिगत खनन कार्य बंद कर दिया गया।सांसद ने बताया कि 1989 में राजहारा ओपनकास्ट परियोजना को रणनीतिक मापदंडों के साथ मंजूरी मिली, जिसमें एनजी एरिया भी शामिल है।इस परियोजना की अधिकतम उत्पादन क्षमता 0.50 मिलियन टन प्रति वर्ष तय की गई, जबकि परियोजना क्षेत्र 736.36 हेक्टेयर में फैला है।वित्तीय वर्ष 1990-91 से यहां वाणिज्यिक कोयला उत्पादन शुरू हुआ।राजहारा परियोजना पंडवा और राजहारा गांव, पंडवा प्रखंड, पलामू जिला, डाल्टनगंज कोयला क्षेत्र में स्थित है।निकटतम रेलवे स्टेशन कजरी स्टेशन (4 किमी) है, जबकि सड़क संपर्क एनएच-75 (डाल्टनगंज–औरंगाबाद) से है।वर्ष 2010 में बॉटम सीम से कोयला निकालते समय गंभीर हादसा हुआ। कोयले की सतह और नीचे पुरानी खदानों के बीच की मोटाई 3 मीटर से
भी कम थी, जो अचानक ढह गई। इससे खदान क्षेत्र में पानी भर गया और खनन कार्य ठप हो गया।इसके बाद 10 नवंबर 2010 को माइंस एक्ट 1952 की धारा 23(3) के तहत खनन पर रोक लगा दी गई। केवल जलभराव से बचाव के सीमित कार्यों की अनुमति दी गई।2014 में 149.38 हेक्टेयर लीज क्षेत्र के लिए पर्यावरणीय दस्तावेज, फॉर्म-1 और प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार की गई।2015 में कुछ शर्तों के साथ आंशिक राहत मिली और मानसून अवधि (15 जून–31 अक्टूबर) को छोड़कर खनन की अनुमति दी गई।नए एमओईएफ और जेबीओसी अनुमोदन के बाद 15 दिसंबर 2020 से खदान में कार्य पुनः शुरू हुआ।सांसद ने बताया कि सामान्य उत्पादन क्षमता 0.30 मिलियन टन प्रति वर्ष, जबकि अधिकतम 0.50 मिलियन टन प्रति वर्ष निर्धारित है।परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी फरवरी 2037 तक वैध है, जिससे दीर्घकालीन संचालन सुनिश्चित होता है।संचालन की सहमति मार्च 2026 तक वैध है, जिसका नवीनीकरण प्रक्रियाधीन है।पूरी तरह प्रतिबंध हटाने के लिए नदी तट सुदृढ़ीकरण और सभी शर्तों के पालन पर जोर दिया गया है।राजहारा परियोजना में अनुमानित 4.9 मिलियन टन कोयला भंडार है।कोयला निकालने के लिए लगभग 12.6 मिलियन क्यूबिक मीटर ओवरबर्डन हटाना होगा।परियोजना की अनुमानित अवधि 18 वर्ष है।भूमि विस्थापितों के लिए अब तक 11 आवेदन प्राप्त हुए हैं, जिनमें से 2 को रोजगार दिया जा चुका है, 4 अंतिम चरण में हैं और 5 प्रारंभिक जांच में हैं। इसके अलावा 9 आवेदन प्रतीक्षारत हैं।उच्च गुणवत्ता वाले कोयले से बेहतर राजस्व के साथ क्षेत्रीय आर्थिक विकास को गति मिलेगी।प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार से स्थानीय लोगों की आजीविका सशक्त होगी।राजहारा परियोजना के तहत अब तक 8 गहरे बोरवेल, स्कूलों में 4 क्रिकेट पिच, नियमित मेडिकल हेल्थ कैंप आयोजित किए जा चुके हैं।आगामी योजनाओं में सिलाई मशीन वितरण और स्कूल बेंच की व्यवस्था शामिल है।सांसद ने कहा कि खदान के पूर्ण संचालन के बाद CSR के तहत और भी जनकल्याणकारी योजनाएं लागू की जाएंगी।प्रेस वार्ता के अंत में सांसद विष्णु दयाल राम ने कहा कि “राजहारा कोल परियोजना का पुनर्जीवन पलामू ही नहीं, पूरे क्षेत्र के लिए रोजगार, विकास और आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बनेगा।”खबर देखने के लिए channel को सब्सक्राइब करें, बेल आइकॉन को दबाएं, लाइक करें औऱ लिंक को शेयर करें।
भी कम थी, जो अचानक ढह गई। इससे खदान क्षेत्र में पानी भर गया और खनन कार्य ठप हो गया।इसके बाद 10 नवंबर 2010 को माइंस एक्ट 1952 की धारा 23(3) के तहत खनन पर रोक लगा दी गई। केवल जलभराव से बचाव के सीमित कार्यों की अनुमति दी गई।2014 में 149.38 हेक्टेयर लीज क्षेत्र के लिए पर्यावरणीय दस्तावेज, फॉर्म-1 और प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार की गई।2015 में कुछ शर्तों के साथ आंशिक राहत मिली और मानसून अवधि (15 जून–31 अक्टूबर) को छोड़कर खनन की अनुमति दी गई।नए एमओईएफ और जेबीओसी अनुमोदन के बाद 15 दिसंबर 2020 से खदान में कार्य पुनः शुरू हुआ।सांसद ने बताया कि सामान्य उत्पादन क्षमता 0.30 मिलियन टन प्रति वर्ष, जबकि अधिकतम 0.50 मिलियन टन प्रति वर्ष निर्धारित है।परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी फरवरी 2037 तक वैध है, जिससे दीर्घकालीन संचालन सुनिश्चित होता है।संचालन की सहमति मार्च 2026 तक वैध है, जिसका नवीनीकरण प्रक्रियाधीन है।पूरी तरह प्रतिबंध हटाने के लिए नदी तट सुदृढ़ीकरण और सभी शर्तों के पालन पर जोर दिया गया है।राजहारा परियोजना में अनुमानित 4.9 मिलियन टन कोयला भंडार है।कोयला निकालने के लिए लगभग 12.6 मिलियन क्यूबिक मीटर ओवरबर्डन हटाना होगा।परियोजना की अनुमानित अवधि 18 वर्ष है।भूमि विस्थापितों के लिए अब तक 11 आवेदन प्राप्त हुए हैं, जिनमें से 2 को रोजगार दिया जा चुका है, 4 अंतिम चरण में हैं और 5 प्रारंभिक जांच में हैं। इसके अलावा 9 आवेदन प्रतीक्षारत हैं।उच्च गुणवत्ता वाले कोयले से बेहतर राजस्व के साथ क्षेत्रीय आर्थिक विकास को गति मिलेगी।प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार से स्थानीय लोगों की आजीविका सशक्त होगी।राजहारा परियोजना के तहत अब तक 8 गहरे बोरवेल, स्कूलों में 4 क्रिकेट पिच, नियमित मेडिकल हेल्थ कैंप आयोजित किए जा चुके हैं।आगामी योजनाओं में सिलाई मशीन वितरण और स्कूल बेंच की व्यवस्था शामिल है।सांसद ने कहा कि खदान के पूर्ण संचालन के बाद CSR के तहत और भी जनकल्याणकारी योजनाएं लागू की जाएंगी।प्रेस वार्ता के अंत में सांसद विष्णु दयाल राम ने कहा कि “राजहारा कोल परियोजना का पुनर्जीवन पलामू ही नहीं, पूरे क्षेत्र के लिए रोजगार, विकास और आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बनेगा।”खबर देखने के लिए channel को सब्सक्राइब करें, बेल आइकॉन को दबाएं, लाइक करें औऱ लिंक को शेयर करें।




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