गढ़वा। चिकित्सा क्षेत्र में उत्कृष्ट चिकित्सकीय दक्षता, त्वरित निर्णय क्षमता और समर्पित आपातकालीन सेवा का परिचय देते हुए गढ़वा क...
गढ़वा। चिकित्सा क्षेत्र में उत्कृष्ट चिकित्सकीय दक्षता, त्वरित निर्णय क्षमता और समर्पित आपातकालीन सेवा का परिचय देते हुए गढ़वा के चिनिया रोड स्थित परमेश्वरी मेडिकल सेंटर की विशेषज्ञ टीम ने तीन युवा महिलाओं का जीवन बचाने में सफलता प्राप्त की है। ये तीनों मरीज रप्चर्ड एक्टोपिक प्रेग्नेंसी (Ruptured Ectopic Pregnancy) एवं गंभीर हेमोपेरिटोनियम (Hemoperitoneum) जैसी अत्यंत गंभीर और जानलेवा अवस्था में अस्पताल लाई गई थीं।
20 से 25 वर्ष आयु वर्ग की इन मरीजों की स्थिति अस्पताल पहुंचने तक अत्यधिक नाजुक हो चुकी थी। शरीर में अत्यधिक आंतरिक रक्तस्राव होने के कारण वे हाइपोवोलेमिक शॉक (Hypovolemic Shock) की अवस्था में थीं। ऐसी स्थिति में परमेश्वरी मेडिकल सेंटर की सर्जिकल एवं क्रिटिकल केयर टीम ने बिना समय गंवाए त्वरित चिकित्सकीय हस्तक्षेप करते हुए आपातकालीन ऑपरेशन सफलतापूर्वक संपन्न किया।
विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ. निशांत एवं डॉ. नीतू के नेतृत्व में प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ की सतर्कता और कुशल समन्वय के कारण तीनों मरीजों की जान बचाई जा सकी। वर्तमान में सभी मरीज सुरक्षित हैं तथा तेजी से स्वस्थ हो रही हैं।
आठ वर्षों में 100 से अधिक सफल ऑपरेशन, क्षेत्र में बना भरोसे का केंद्र
परमेश्वरी मेडिकल सेंटर ने पिछले आठ वर्षों में एक्टोपिक प्रेग्नेंसी के 100 से अधिक सफल ऑपरेशन कर क्षेत्र में महिला रोग एवं आपातकालीन प्रसूति चिकित्सा के क्षेत्र में अपनी विशेष पहचान स्थापित की है।चिकित्सकों के अनुसार इन मामलों में लगभग 60 प्रतिशत मरीजों का उपचार आधुनिक लैप्रोस्कोपिक तकनीक (कीहोल सर्जरी) द्वारा किया गया, जिससे मरीजों को कम दर्द, न्यूनतम दाग तथा शीघ्र रिकवरी का लाभ मिला। वहीं गंभीर रक्तस्राव एवं जटिल स्थिति वाले मामलों में मरीज की जान बचाने हेतु ओपन सर्जरी तकनीक का उपयोग किया गया।
क्या होती है एक्टोपिक प्रेग्नेंसी?
सामान्य गर्भावस्था में निषेचित अंडा गर्भाशय के भीतर विकसित होता है, जबकि एक्टोपिक प्रेग्नेंसी में भ्रूण गर्भाशय के बाहर, प्रायः फैलोपियन ट्यूब में विकसित होने लगता है। भ्रूण के बढ़ने के साथ ट्यूब फटने का खतरा बढ़ जाता है, जिसे रप्चर कहा जाता है।
रप्चर होने पर पेट के भीतर अत्यधिक रक्तस्राव होने लगता है, जिसे चिकित्सकीय भाषा में हेमोपेरिटोनियम कहा जाता है। समय पर उपचार न मिलने पर यह स्थिति मरीज की जान के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
“हर सेकंड था बेहद कीमती” — डॉ. निशांत
मामले की गंभीरता पर प्रकाश डालते हुए डॉ. निशांत ने कहा कि अस्पताल पहुंचने तक तीनों मरीज अत्यधिक रक्तस्राव के कारण गंभीर अवस्था में थीं।
“अत्यधिक ब्लीडिंग के कारण मरीज शॉक में थीं, त्वरित सर्जरी ही जीवन बचाने का एकमात्र विकल्प था” — डॉ. निशांत
उन्होंने कहा,
“जब ये मरीज हमारे पास पहुंचीं तब वे गंभीर हाइपोवोलेमिक शॉक में थीं। ऐसे मामलों में प्रत्येक सेकंड अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। हमारी टीम ने तुरंत स्थिति का आकलन किया, मरीजों को स्थिर किया और आपातकालीन सर्जरी कर रक्तस्राव नियंत्रित करते हुए उनकी जान बचाई। समय पर चिकित्सकीय हस्तक्षेप ही इन मरीजों के लिए जीवनदायी साबित हुआ।”
“शुरुआती गर्भावस्था में तेज पेट दर्द को कभी सामान्य न समझें” — डॉ. नीतू
महिलाओं को जागरूक करते हुए डॉ. नीतू ने कहा कि शुरुआती गर्भावस्था में होने वाले कुछ लक्षण गंभीर खतरे का संकेत हो सकते हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना घातक सिद्ध हो सकता है।
“पेल्विक क्षेत्र में तेज दर्द, ब्लीडिंग या चक्कर आना गंभीर चेतावनी हो सकती है” — डॉ. नीतू
उन्होंने कहा,
“गर्भावस्था के शुरुआती चरण में पेट या पेल्विक क्षेत्र में तेज, चुभने वाला या असहनीय दर्द सामान्य नहीं माना जाता। यदि इसके साथ ब्लीडिंग, चक्कर, बेहोशी, ठंडा पसीना या कंधे में दर्द जैसे लक्षण हों तो तुरंत चिकित्सकीय जांच आवश्यक है। थोड़ी सी भी लापरवाही मरीज की जान को गंभीर खतरे में डाल सकती है।” ऑपरेशन में देरी बढ़ा सकती है जान का खतरा डॉक्टरों ने बताया कि अधिकांश मामलों में मरीज और उनके परिजन शुरुआती लक्षणों को सामान्य पेट दर्द समझ लेते हैं, जिसके कारण अस्पताल पहुंचने में देर हो जाती है। वहीं जब चिकित्सक तत्काल ऑपरेशन की सलाह देते हैं, तो घबराहट एवं असमंजस के कारण निर्णय लेने में और विलंब हो जाता है।डॉक्टरों ने अपील करते हुए कहा कि एक्टोपिक प्रेग्नेंसी पूर्णतः मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें त्वरित निर्णय ही मरीज की जान बचा सकता है। समय पर ऑपरेशन नहीं होने पर लगातार आंतरिक रक्तस्राव मरीज को गंभीर शॉक में पहुंचा देता है और सर्जरी का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
महिलाओं और परिवारों के लिए डॉक्टरों की महत्वपूर्ण सलाह
परमेश्वरी मेडिकल सेंटर की टीम ने सुरक्षित मातृत्व हेतु महिलाओं एवं उनके परिजनों को कुछ आवश्यक सावधानियां अपनाने की सलाह दी है—
गर्भधारण की पुष्टि के बाद छठे से आठवें सप्ताह के बीच अल्ट्रासाउंड अवश्य कराएं।
शुरुआती गर्भावस्था में दर्द या ब्लीडिंग को बिल्कुल नजरअंदाज न करें।
बिना चिकित्सकीय सलाह के दर्द निवारक दवाओं का सेवन न करें।
किसी भी असामान्य लक्षण पर तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से संपर्क करें।
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